विशेष रिपोर्ट:
‘लाड़ली’ राजनीति और कर्ज का चक्रव्यूह—धराशायी होता वित्तीय अनुशासन
आधी आबादी, पूरा वोट और गहराता कर्ज
त्वरित टिप्पणी: राकेश प्रजापति
भारतीय राजनीति में ‘महिला वोट बैंक’ को साधने की होड़ ने राज्यों के खजाने की चूलें हिला दी हैं। विशेषकर भाजपा शासित राज्यों में ‘लाड़ली बहना’ या ‘महतारी वंदन’ जैसी योजनाओं के माध्यम से महिलाओं को सीधे नकद हस्तांतरण (DBT) किया जा रहा है।

नीतिगत रूप से यह “गरीब के मुंह में जीरा” जैसा है, क्योंकि एक तरफ चंद रुपये थमाए जा रहे हैं और दूसरी तरफ कमरतोड़ महंगाई और बेरोजगारी का बोझ बढ़ाया जा रहा है।
1. कर्ज के दलदल में डूबे राज्य: वर्तमान आंकड़े बताते हैं कि भाजपा शासित प्रमुख राज्यों पर कर्ज का बोझ खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है। विकास के दावों के बीच यह ‘ब्याज का दुष्चक्र’ आने वाली पीढ़ियों के लिए “गले की फांस” बनता जा रहा है।
राज्य अनुमानित कुल कर्ज (2024-25) वित्तीय स्थिति की गंभीरता
उत्तर प्रदेश ₹8.16 लाख करोड़ से अधिक, सबसे अधिक कर्ज वाला राज्य।
महाराष्ट्र ₹7.11 लाख करोड़ लगभग, बुनियादी ढांचे से अधिक लोकलुभावन खर्च।
मध्य प्रदेश ₹4.35 लाख करोड़ लगभग, ‘लाड़ली बहना’ जैसी योजनाओं के लिए भारी ऋण।
राजस्थान ₹5.79 लाख करोड़ लगभग पुरानी पेंशन और नई योजनाओं का दोहरा दबाव।
2. महंगाई और बेरोजगारी: ‘आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपैया’ सरकार महिलाओं के खातों में 1000-1500 रुपये डालकर अपनी पीठ थपथपा रही है, लेकिन उसी समय रसोई गैस, खाद्य तेल और दालों की कीमतें आसमान छू रही हैं। यह “एक हाथ से देना और दूसरे हाथ से दुगुना वसूलना” वाली रणनीति है। जब युवाओं के पास रोजगार नहीं होगा, तो परिवार के एक सदस्य को मिलने वाली ‘खैरात’ पूरे घर का चूल्हा जलाने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकती।
3. ‘मुफ्तखोरी’ का मनोवैज्ञानिक प्रहार: अत्यंत गंभीर पहलू यह है कि यह संस्कृति समाज को “कायर और कामचोर” बना रही है। जब बिना परिश्रम के नकद राशि मिलने लगती है, तो श्रम की गरिमा समाप्त हो जाती है।
लोग स्वरोजगार या कठिन श्रम के बजाय सरकारी मदद के इंतजार में ‘हाथ पर हाथ धरे’ बैठना पसंद करने लगे हैं।
आर्थिक रूप से सरकार पर निर्भर व्यक्ति सत्ता से सवाल पूछने का साहस खो देता है। यह “गुलाम मानसिकता” को जन्म देने का आधुनिक तरीका है।
4. अर्थव्यवस्था को ‘चुनावी चॉकलेट’ से नहीं, बल्कि ठोस नीतियों, उद्योगों और रोजगार सृजन से सुधारा जा सकता है। महिलाओं को ‘सॉफ्ट टारगेट’ बनाकर वोट हासिल करना लोकतंत्र के लिए “मीठा जहर” है। यदि समय रहते कर्ज की इस बेतहाशा दौड़ को नहीं रोका गया, तो राज्यों के पास विकास कार्यों के लिए “कौड़ी भी नहीं बचेगी”।
“लोकतंत्र का असली गहना जनता की आत्मनिर्भरता है, न कि उसकी सरकारी बैसाखियों पर निर्भरता।”